भोतिक वादी युगकहां खो रहा इंसान और इंसानियत अंधी दौड़ में बहक रहे नयी पीढ़ी के आधुनिक युवा





आजकल भौतिकवाद का ज़माना है सब लोग धन और भोगों के पीछे पड़े हैं, बच्चे भी और माता-पिता भी, सबका चिंतन यही है, कि खूब धन होना चाहिए, जितना अधिक धन होगा, उतना ही हम अधिक सुखी हो जाएंगे यह चिंतन ग़लत है, इस ग़लत चिंतन के कारण बहुत से लोग अधिक धन कमाने के लोभ से भारत देश को छोड़कर विदेशों में चले जाते हैं, क्योंकि वहां धन अधिक मिलता है, विदेश जाने का बहाना यह होता है, कि "हम पढ़ाई करने के लिए जा रहे हैं और फिर 2/4 वर्ष तक वहां पढ़ने के बाद, वहां का रहन सहन और वहां की कुछ सुविधाएं देखकर लोग जीवन भर वहीं रहना चाहते हैं, और रह भी जाते हैं," "उनके माता-पिता भारतीय सभ्यता संस्कृति वाले होने के कारण वे विदेश में नहीं रह पाते। क्योंकि वहां की सभ्यता, भारत से अलग होती है," इसका परिणाम यह होता है कि "बच्चे विदेश में रहते हैं, और उनके माता-पिता भारत देश में, दोनों अलग-अलग हो जाते हैं  जब माता-पिता की वृद्धावस्था आती है, तब उन्हें धन से अधिक बच्चों की सेवा की आवश्यकता होती है। उस समय बच्चे उनके पास नहीं होते। तब माता पिता भारत में दुखी होते हैं, और सोचते हैं, कि *"हमने अपने बच्चों के लिए 20/22 वर्ष तपस्या की। उन्हें खिलाया पिलाया पढ़ाया लिखाया। उन पर 2/3 करोड़ रुपये का खर्चा भी किया। आज हमारी वृद्धावस्था में  वे हमारे पास नहीं हैं। वे हमारी सेवा नहीं करते। जबकि हमें आज उनकी सेवा की आवश्यकता है। तो इतना सब कुछ करने के बाद भी हमें क्या मिला? कुछ नहीं। हमने उन्हें विदेश भेजकर बहुत बड़ी भूल की।" "तब बुढ़ापे में आकर माता-पिता को अपनी भूल समझ में आती है। और माता-पिता इस प्रकार से सोच-सोच कर दुखी होते हैं। उनकी वृद्धावस्था बहुत कष्टमय हो जाती है उधर बच्चे विदेश में अकेले होते हैं। माता-पिता की उनके ऊपर कोई रोक टोक नहीं होती। वे अधिक धन कमा लेने के कारण भौतिक सुखों को भोगने में पूरी तरह से डूब जाते हैं। इससे उन का मानसिक आध्यात्मिक चारित्रिक पतन ही होता है। क्योंकि वे वहां यज्ञ आदि पुण्य कर्म भी नहीं कर पाते। वहां इस प्रकार की सुविधाएं प्रायः नहीं हैं। वहां भारत जैसे धार्मिक संगठन भी विशेष नहीं होते, जिनकी सहायता से बच्चे प्रति सप्ताह आर्य समाज आदि संस्थाओं में जाकर कुछ विद्वानों के प्रवचन सुनकर अपनी आध्यात्मिक उन्नति कर सकें इस प्रकार से विदेशों में जाकर बच्चों ने यदि धन बहुत अधिक कमा भी लिया, और न वे माता पिता की सेवा कर सके, न ही कोई आध्यात्मिक उन्नति कर पाए, तो उनका जीवन भी सार्थक नहीं है, व्यर्थ है।" "क्योंकि पुण्य कर्म तो वे वहां विशेष कमा नहीं पाते, जो कि मनुष्य जीवन की असली पूंजी है। जो इस जन्म में भी काम आती है, और अगले जन्मों में भी। इस प्रकार से विदेशों में रहकर अधिक धन कमा कर भी, बच्चों को भी कोई विशेष लाभ नहीं होता।" अब यदि बच्चे विदेश में जाकर 30/ 40/50 लाख रुपया वार्षिक धन कमा कर भी, यदि अपने माता-पिता के साथ नहीं रहते, उनकी सेवा नहीं करते, उससे पुण्य नहीं कमाते, तो उस 30/40/50 लाख रुपया वार्षिक धन कमाने से क्या लाभ? कुछ नहीं। वह सार्थक नहीं, बल्कि व्यर्थ है। वह धन माता-पिता के लिए भी सुखदायक नहीं है, और बच्चों के लिए भी यह एक गंभीर विषय है। इसलिए माता-पिता और बच्चे दोनों ही कृपया इस पर गंभीरता से चिंतन करें, बच्चे भले ही धन थोड़ा कम कमाएं, परंतु वृद्धावस्था में अपने माता-पिता की सेवा अवश्य करें, उनके साथ रहें। चाहे भारत देश में भी रहें, तो भी माता-पिता के साथ रहकर उनकी सेवा करें। उनका आशीर्वाद लेवें, उनके मार्गदर्शन में चलें, तो आप बहुत अधिक पुण्य कमा पाएंगे, और तब आपको इस जीवन में सुख भी मिलेगा और पुण्य भी। इस प्रकार से वृद्धावस्था में अपने माता-पिता की सेवा करते हुए अपने जीवन और धन को सार्थक बनाएं।

-स्वामी विवेकानन्द परिव्राजक, निदेशक - दर्शन योग महाविद्यालय, रोजड़, गुजरात.

ए के सिंह स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक


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